वक़्त गुजर गया, और हम सोचते रहे

Intro

वक़्त गुजर गया, और हम सोचते रहे — यह पंक्ति सिर्फ़ एक शायरी नहीं, बल्कि उस अधूरेपन की आवाज़ है जिसे हर इंसान कभी न कभी महसूस करता है। ज़िंदगी के सफ़र में कई मौके ऐसे आते हैं जब हम तैयारी करते रह जाते हैं और वक़्त आगे बढ़ जाता है। यह शायरी उन्हीं पलों का आईना है, जहाँ सपने टूटते नहीं, बस पीछे छूट जाते हैं। अक्सर वक़्त गुजर गया, और हम सोचते रहे और ज़िंदगी आगे बढ़ जाती है।

इस शायरी में बिखरे हुए ख़्वाब, बदलते रिश्ते, और ठहरता हुआ वक़्त साफ़ दिखाई देता है। हर शेर जीवन की उस सच्चाई को छूता है, जहाँ चाहत मौजूद होती है लेकिन हालात साथ नहीं देते। यह रचना इंतज़ार, पछतावे और आत्ममंथन की भावना को शब्द देती है —, बेहद सादगी से।

वक़्त गुजर गया, और हम सोचते रहे

ख़्वाब बिखरे पत्तों से, रिश्ते चुभते काँटों से,
सूना हो गया हर उपवन, वक़्त के बबूलों से।

वक़्त गुजर गया, और हम सोचते रहे

हम वहीं ठहरे रहे, मौसम बदलते रहे,
काफ़िला निकल गया, हम सोचते ही रहे।

वक़्त गुजर गया, और हम सोचते रहे

होश आने से पहले ही शाम उतर आई,
कदम बढ़ाए तो लगा ज़िंदगी रूठ गई।

वक़्त गुजर गया, और हम सोचते रहे

एक-एक पत्ती खामोश हुई, डालियाँ जलती रहीं,
दिल में चाहत जिंदा रही, उम्र मगर ढलती रही।

वक़्त गुजर गया, और हम सोचते रहे

अल्फ़ाज़ रो पड़े, जज़्बात खामोश हुए,
साथ जले जो दीप थे, राख में बदलते हुए।

वक़्त गुजर गया, और हम सोचते रहे

मोड़ पे झुकी साँसें थीं, वक़्त जैसे थम सा गया,
उम्र की हर ढलान का मंज़र दिखता गया।

वक़्त गुजर गया, और हम सोचते रहे

वो निखार कि आईना भी खुद से डर गया,
एक लम्हे में ज़मीन-आसमान पास आ गया।

वक़्त गुजर गया, और हम सोचते रहे

फिर चली ऐसी बयार, हर कली बिखर गई,
हर गली में सन्नाटा, हर ख़ुशी ठहर गई।

वक़्त गुजर गया, और हम सोचते रहे

हाथों में ताक़त थी कि चाँद सजा लेते,
होंठों में हिम्मत थी कि तक़दीर मना लेते।

वक़्त गुजर गया, और हम सोचते रहे

कुछ बदल न पाए मगर, रात ही सहर बन गई,
ढहते ख़्वाबों की वजह से नींद भी डर बन गई।

वक़्त गुजर गया, और हम सोचते रहे

जब उम्मीद की किरण, मांग में उतर आई,
एक ही झटके ने सारी रीत मिटा डाली।

वक़्त गुजर गया, और हम सोचते रहे

पालकी तैयार थी, राह निहारते रहे,
हम ज़रा दूर खड़े बस तमाशा देखते रहे।

वक़्त गुजर गया, और हम सोचते रहे

निष्कर्ष

वक़्त गुजर गया, और हम सोचते रहे —निष्कर्ष

वक़्त गुजर गया, और हम सोचते रहे — यही इस शायरी का सबसे बड़ा सच है। ज़िंदगी अक्सर बिना रुके आगे बढ़ जाती है, और इंसान तय करता रह जाता है कि कौन-सा मोड़ सही था और कौन-सा छूट गया। जो पल थामे नहीं जा सके, वही याद बनकर भीतर टीस पैदा करते हैं; जो शब्द कहे नहीं गए, वही उम्र भर मन में गूंजते रहते हैं।

यह शायरी सिर्फ़ बीते वक़्त का अफ़सोस नहीं है, बल्कि आत्मचिंतन की एक शांत पुकार है। जब हम कहते हैं waqt guzar gaya aur hum sochte rahe, तो इसका अर्थ यह नहीं कि जीवन समाप्त हो गया, बल्कि यह कि हमें अपने आज को और सजग होकर जीना चाहिए।

अगर आज भी दिल किसी पुराने सवाल में उलझा है, तो यह रचना याद दिलाती है कि हर सुबह एक नया अवसर लेकर आती है। वक़्त फिर गुजर जाएगा—लेकिन इस बार, काश हम सिर्फ़ सोचते न रह जाएँ, बल्कि हिम्मत करके आगे भी बढ़ें।


🌿 शायरी का भावार्थ (Additional Context)

इस शायरी में बिखरे पत्ते टूटे सपनों का प्रतीक हैं, जबकि बबूलों का उल्लेख उन परिस्थितियों को दर्शाता है जो सुंदरता को भी पीड़ा में बदल देती हैं। दीपों का बुझना उम्मीदों के क्षीण होने का संकेत है और कारवां का आगे बढ़ जाना समय की उस सच्चाई को उजागर करता है जिसे कोई रोक नहीं सकता। यह रचना पाठक को ठहरकर सोचने के साथ-साथ यह भी सिखाती है कि वक़्त की क़ीमत तभी समझ आती है, जब वह हाथ से निकल चुका होता है।

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